आल्हा और ऊदल

लेख़क मनीश  ओझा ने आल्हा गायन की कला के पिछड़ने का दर्द बयान किया

lallu vajpayee

हमारे देश  भारत में, ख़ासकर उत्तर भारत में ‘परसंस्कृतिग्रहण’ का दौर चल रहा है । जब कोई  समाज अपने से उच्च समाज के रहन सहन, खान पान, बोल चाल, पहनावा आदि को इस उद्देष्य से अपनाने लगता है कि वो इस समाज से अधिक स्तरीय है तो इस प्रक्रिया को परसंस्कृतिग्रहण कहा जाता है । वर्तमान में उत्तरभारत में यही हो रहा है । आधुनिकता के इस बिगड़े स्वरूप ने हमें अपनी संस्कृति से विमुख होकर पाष्चात्य सभ्यता की तरफ़ उन्मुख कर दिया है। जिस समाज की अपनी कोइ संस्कृति नहीं होती उसका अपना कोइ अस्तित्व नहीं होता ।  कलाऐं किसी समाज का आइना होती हैं। आज के दौर में भारत की बहुत सी क्षेत्रिय कलाऐं मृत्प्राय हो चुकी हैं, जिसमें से एक कला है ‘आल्हा।’

आल्हा उत्तरप्रदेश  की एक काव्य कला है, जो वीर रस से परिपूर्ण  है । माना जाता है कि कालिंजर के राजा परमार के दरबार मे जगनिक नाम के एक कवि थे, जिन्होंने महोबा के दो प्रसिद्ध वीर आल्हा और  ऊदल(उदयिसंह)- के वीरचरित्र  का वर्णन एक वीरगीतात्मक काव्य के रूप में रचा था जो इतना सर्वप्रिय हुआ कि उसके वीरगीतों का प्रचार क्रमश: सारे उत्तर भारत में विशेषत: उन सब प्रदेशों में जो कन्नौज साम्राज्य में आते थे, हो गया था। आल्हा और ऊदल के पिता जच्छराज (जासर) और माता देवला थी।

आल्हा और उदल परमार के सामंत थे और बनाफर शाखा के क्ष़त्रीय थे। माडौ़ के राजा करिंगा ने आल्हा-उदल के पिता जच्छराज-बच्छराज को मरवा के उनके खोपड़ियेां को कोल्हू में पिरवा दिया  थां। उदल को जब यह बात पता चली तो उन्होंने अपने पिता की मौत का बदला लिया तब उनकी उम्र मात्र १२ वर्ष थी। आल्हखण्ड मे गाया जाता है कि इन दोनों भाइयों का युद्ध दिल्ली के तत्कालीन शासक पृथ्वीराज चौहान से हुआ था।

आल्हा और ऊदल से संबन्धित गीतों के समुच्चय को ‘आल्हाखंड’ कहते हैं  जिससे अनुमान मिलता है कि आल्हा संबंधी ये वीरगीत जगनिक के रचे उस काव्य के एक खंड के अंतर्गत थे जो चंदेलों के वीरता के वर्णन में लिखा गया होगा। आल्हाखंड में तमाम लड़ाइयों का ज़िक्र है। शुरूआत मांडौ़ की लड़ाई से है। आल्हाखंड में युद्ध में लड़ते हुये मर जाने को लगभग हर लड़ाई में महिमामंडित किया गया है। गाया जाता है-

मुर्चन-मुर्चन नाचै बेंदुला,उदल कहैं पुकारि-पुकारि,

भागि न जैयो कोऊ मोहरा ते, यारौं रखियो धर्म हमार।

खटिया परिकेैे जौ मरि जैहौ, बु​िड़़हैं सात साख को नाम

रन मा लड़िकै जौ मरि जैहौ, होइहै जुगन-जुगन लै नाम।

इसमें अवधी एवं बुन्देली बोली का प्रयोग किया गया है। इसे सबसे कुशल तरीक़े से गाते रहे थे  आल्हा सम्राट स्व श्री लल्लू बाजपेयी जी । यह काव्य गाने के  लिये ही रचा गया था । पंडितों     और विद्वानों के हाथ इसकी रक्षा के लिये नहीं बढ़े, जनता ही के बीच इसकी गूंज बनी रही। सबसे खूबसूरत तथ्य है कि बिना किसी लिखित दस्तावेज़ के यह कला आज तक जीवित है और पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तान्तरित होती रही परन्तु अब इसके प्रचार प्रसार पर ख़तरे की तलवार लटक रही है । हांलाकी दूरदर्शन ‘सबसे बड़े लड़इया’ नामक कार्यक्रम से आल्हा-उदल की कहानी लोगों तक पहुंचाने का उत्कृश्ट कार्य कर रहा है ।

हमें आधुनिक विकास के साथ साथ पुरानी  लोककलाओं को भी बचाना होगा] तो सर्वप्रथम इन कलाओं के प्रति हमें अपने हृदय मे सम्मान पैदा करना होगा और इनसे संबन्धित कलाकारों के रोजी़ रोटी का प्रबंध करना होगा । तब जाकर हम आधुनिक होने के साथ साथ अपनी पहचान अपनी संस्कृति को बचा पायेंगे  । वरना कुछ पुराने शब्दों  की तरह हमसे हमारी भारतीय संस्कृति भी दूर हो जायेगी और हम भारतीए  एक बार फ़िर ग़ुलाम होंगे । इस बार औपनिवेषिक न सही सांस्कृतिक होंगे  । कुछ तो हो भी चुके हैं , भाशाएं दूसरी तो राजा राममोहन राय, गांधी जी आदि ने भी सीखी थी परन्तु दुसरों सें संवाद स्थापित करने के लिए, स्तरीय भेद भाव के लिए नहीं ।

उम्मीद करता हूं कि हम युवा इस ग़ुलषन के किसी भी फूल को मुरझाने नहीं देंगे  । मेरी उम्मीद को बल मिलता है जब याद आता है, वो दिन जब श्रीराम कला केन्द्र दिल्ली में ,उर्मिल कुमार थपलियाल द्वारा निर्देषित नौटंकी देखने का अवसर प्राप्त हुआ था । प्रेक्षाग्रह दिल्ली दे छोरों से भरा हुआ था और सब उतनी ही शिद्दत  से नौटंकी के नक्कारों का मजा़ ले रहे थे जितनी लगन से यो यो हनी सिंह का ब्लु है पानी पानी सुनते हैं ।

ये गुलषन कभी उजडने़ न देंगे

यहां पुश्प हर प्रभात में खिलते रहेंगे

हम युवा हैं इस बाग़ के माली, मनीष !

प्राण भी देना पड़े, हंसकर वतन की रक्षा करेंगे ।

aalha

मनीष ओझा                                               krantimanish2@gmail.com