पेश है लेखिका मनीषा श्री से मनीष ओझा की ख़ास बातचीत !

ऐसा लग रहा है हिन्दी लेखकों के बहुरते दिन हैं। ऐसा मैं नहीं कह रहा हूँ। बल्क़ि ये उनसे बताया जा रहा है जो हिन्दी के लिए कुछ करने के बजाय हिन्दी लेखकों को यह सलाह देते हैं कि अंगरेज़ी में लिखो। अंगरेज़ी की मार्केट है, आज कल हिन्दी में कहाँ कोई पढ़ना चाहता है। मैं भी यहाँ तक मानता हूँ कि पढ़ने के मामले में पाठक अंगरेज़ी की तरफ आकर्षित हो रहे हैं। लेकिन हिन्दी कोई पढ़ना ही नहीं चाहता या हिन्दी में कोई लेखक बेस्ट सेलर नहीं हो सकता, मैं नहीं मानता। दरअसल हिन्दी से लोगों की दूरी बनने के कई कारण हैं। जैसे आज के किसी हिन्दी लेखक और प्रकाशक ने हिन्दी के लिए उतनी मेहनत नहीं की जितनी की करनी चाहिए। बस मन में मान कर बैठ गए कि हिन्दी तो अब कोई पढ़ना नहीं चाहता।, दूसरा लोगों ने अंगरेज़ी को स्तर के तौर पर भी देखना शुरू कर दिया। और फिर हिन्दी लेखकों ने आदर्श का एक अलग ही खाका तैयार कर लिया। जिससे वे साहित्य के ब्रैंडिंग को गलत मानते हैं वे अपनी किताबों का प्रमोशन नहीं कर पाते। फलस्वरूप बहुत से पाठकों तक उनकी पुस्तकें पहुँच ही नहीं पातीं। लेकिन ज़माना बदल रहा है और बदलते दौर के साथ नए हिन्दी लेखकों ने प्रचार करना भी सीख लिया है और स्टार तथा बेस्ट सेलर भी बन रहे हैं। इन्हीं लेखकों में से एक युवा लेखिका हैं “मनीषा श्री” अभी इनकी हाल ही में “ज़िन्दगी की गुल्लक” नामक किताब प्रकाशित हुई है। सिर्फ प्रकाशित ही नहीं हुयी है, दो महीने के भीतर पहला संस्करण ख़त्म भी हो गया है। और दूसरा बस आने ही वाला है। अर्थात मनीषा जी हिन्दी के प्रति बन रही लोगों की धारणावों को गलत साबित करते हुए यह दिखाया कि भाषा किसी भी व्यक्ति के सफलता में अवरोध नहीं बन सकती। विशेष तौर पर साहित्य में तो बिलकुल भी नहीं क्यूंकि यहाँ अनुवाद परम्परा भी होती है। मनीषा जी से बात किया मनीष ओझा ने। प्रस्तुत है बातचीत का एक छोटा सा हिस्सा।12899938_10153693028888821_83645345_n

अभी आपकी पहली पुस्तक ज़िन्दगी की गुल्लकप्रकाशित हुयी है और काफी हिट हुई है। क्या आपने ऐसी सफलता के बारे में सोचा था ?

गुल्लक को पाठकों ने अपनाया यह मेरे लिए बहुत बड़ी बात है। हिट का तो पता नहीं ,मगर लोगो के दिलों तक शायद मैं अपनी बात पहुंचा पायी हूँ। मैं एक बेहद आम लड़की हूँ। और मेरे आम से अनुभव को ,जो अब तक सिर्फ़ मेरे लिए ख़ास थे, पाठकों ने पढ़ा और उसे ख़ास बना दिया। दिल से अपने सभी पाठकों का शुक्रिया।

आप मलेशिया में रहती हैं। आप IIITयन हैं, ज़ाहिर सी बात है, आप अंगरेज़ी बहुत अच्छा जानती होंगी। फ़िर आपने अपने लिखने का माध्यम हिन्दी क्यों चुना ? जबकि ऐसे समय में ज़्यादातर लेख़क हिन्दी को बाजार और पहुँच के हिसाब से रिस्की मानते हैं।

हम हिन्दी में सोचती है। तो अग्रेज़ी में कैसे दिल का हाल लिख सकती हैं। जिस भाषा में विचार आये, लिखना उसी भाषा में चाहिए। अगर विचार हिन्दी में और लेखन अग्रेज़ी में हो तो उसे लेख़न नहीं अनुवाद कहेंगे। और मैं फिलहाल लिखना चाहती हूँ, अनुवाद करना नहीं। मेरे विचार, मेरी भावना सब मुझे हिन्दी ने ही दिए हैं। यकीन मानिये, जब मैं हिन्दी में लिखती हूँ, तो बहुत आसानी से मन का हाल शब्दों का चोला पहन लेते है, ज्यादा मेहनत नहीं लगती। और रही बात विदेश में रहने और मेरे IIT से होने की। तो घर और डिग्री दोनों जिस देश की देन हो, उसकी भाषा को अपनाने में क्या परेशानी हो सकती है। हमें तो सुकून मिलता है हिन्दी बोलकर या लिखकर। ऐसा लगता है, घर वापिस आ गए। अग्रेज़ी तो हर वक़्त दफ़्तर में रहने का एहसास कराती है।

आपकी किताब ज़िन्दगी की गुल्लकमें एक नए तरीके का प्रयोग है। इस किताब को काव्य संग्रह या कहानी संग्रह कहना मुश्किल है। अर्थात एक साँचे में नहीं ढाला जा सकता। इसके पीछे क्या मक़सद है आपका ?

जी बिल्कुल सही ज़िन्दगी की गुल्लक न ही कहानियों का पिटारा है और न ही एक काव्य संग्रह। यह उन कविताओं की कहानी है जो कविता को जन्म देती हैं। आजकल कविता तो जैसे लुप्त ही हो रही है। अगर कुछ एक माध्यम न हो तो लोगों ने तो कविता पढ़ना ही छोड़ दिया है। किसी भी नयी चीज़ का अविष्कार हो उसके लिए निरंतर प्रयोग की बहुत आवश्यकता होती है। हमारी भाषा को प्रयोग की जरुरत है। श्याद ऐसे प्रयोग भाषा की उन्नती में ज्यादा नहीं तो थोड़ा योगदान दें। एक और बात अक़्सर लोग कविता पढ़ते हैं, और उसकी समीक्षा भी करते हैं। मगर जायदातर लोग कविता लिखे जाने के पीछे कवि की मनोदशा नहीं समझ पाते। मानें की क्या कारण, क्या कहानी या फिर क्या दर्द रहा होगा कवि के मन में, कविता लिखते वक़्त। बस हम अपनी कविता के पीछे छुपी असल कहानी बताना चाहते थे, ताकि उसकी सही समीक्षा हो सके। पाठक अंदाज़ा न लगाये, सच जान सके। कविता की माँ यानी उसके पीछे छुपी कहानी से भी मिल सके।

आपके पसंदीदा कवि कौन हैं और उनकी कौन सी बात आपको सबसे ज़्यादा अच्छी लगती है ?

हरिवंश राय बच्चन। उन्हें पसंद करने के न जाने कितने कारण है। मगर सबसे अहम कारण यह की उनकी भाषा और लेखन दोनों ही सरल और स्पष्ट होता था। जिसे कविता का शौक न भी हो,वो भी कविता से मोहब्बत कर बैठे।

आप अपने ज़िन्दगी से जुडी कौन सी बात पाठकों को बताना चाहेंगी जो आप अपने किताब में नहीं बता पायीं ?

ज़िन्दगी की गुल्लक में ज़िन्दगी की ही बातें है। मेरी हर कहानी और कविता मेरे और मेरे आसपास के माहौल से ही प्रेरणा लेते हैं।

नए लेखकों के लिए आप क्या कहना चाहती हैं ?                                                                

( हँसते हुए कहती हैं ) अरे भाई हम ख़ुद ही नए हैं और सीखना ही तो एक ऐसा काम है जो हमेशा चलता रहता है। हाँ, अपने लेखक दोस्तों से बस यही कहूँगी की सच लिखें,  दिल से लिखें, बिना यह सोचे की आपके लेखन को कोई पाठक मिलेगा की नहीं, बस लिखते रहें । जब कहानी या कविता दिल की जुबान में बात करती है तो उसका रस ही अलग होता है। उसमें एक अलग सी कशिश होती है।

अभी तक आप एक इंजीनियर थीं और एक अघोषित लेखक। अब जब लोग आपको लेखक के तौर पर जानने लगे हैं तब आपके मनोवैज्ञानिक बदलाव क्या हैं ? और लोगों के आपके प्रति नज़रिये में क्या बदलाव हैं ?

( पानी का गिलास उठाते हुए फौरन कहती हैं ) पहले तो शुक्रिया इतना सम्मान देने के लिए। बदलाव बस यह है कि हमें अपना यह रूप बहुत पसंद आ रहा है। लोगो ने तो प्रोत्साहन को जी भर के परोसा है। लिखना हमेशा से मेरा शौक था। बस वक़्त ही नहीं मिला कभी। आज जब वक़्त ने हमे थोड़ा वक़्त दिया तो अपनी शर्तों पर जीने का मौक़ा हमने अपने हाथों से जाने नहीं दिया और रही बात दूसरों के नज़रिये की  मेरे बारे में,  तो वह बहुत शानदार है।  जो लोग मुझे जानते हैं और मेरी पुस्तक उन्होंने पढ़ी है, अपने प्रति उनके बर्ताव उनके प्रेम को देखकर लगता है मैंने सही क्षेत्र चुना है।

आज के दौर में हिन्दी लेखक होने की चुनौतियां क्या क्या हैं ?                                              

हिन्दी लेखन में नहीं बल्कि हिन्दी प्रकाशन में चुनौतियाँ हैं। आज भी हिन्दी में एक से बढ़कर एक लेखक मिल जायेंगे। यकीन न हो तो फेसबुक और whatsapp पर आने वाले message ही देख लें। कुछ लोग तो 4 लाइन्स में ही बड़ी से बड़ी बात बहुत आसानी से बोल देते हैं। यही तो एक अच्छे लेख़क की पहचान है। दिक्कत यह है कि इन लेखकों को मंच नहीं मिल रहा। ज्यादतर प्रकाशन पैसे लेकर छापते हैं। चलिए यह भी बरदाश कर ले मगर कोई भी प्रकाशक किताब के प्रमोशन और sales की ज़िम्मेदारी नहीं लेता। सब लेख़क खुद करता है। पहले लिखता है फिर खुद ही प्रमोशन भी करता है और कई बार sales भी उसी के कन्धों की ज़िम्मेदारी होती है। हो सकता है, कुछ भाग्यशाली लोगों को यह सब जतन न करने पड़े हों, मगर ज़्यादातर हिन्दी लेखकों को इन मुश्किलों को झेलना पड़ता है। उस पर से हौसला देने की जगह यह प्रचार हो रहा है की हिन्दी कोई नहीं पढ़ता । अब ऐसा सुनकर कोई भी हिन्दी में लिखने से पहले कई बार सोचता है। सोचना भी चाहिए। मगर यह जूठ है, हिन्दी पढ़ते हैं लोग और बहुत शौक़ से पढ़ते हैं।  बस हम ही कतराने लगे हैं अपनी भाषा से। अगर सजा सँवार कर हिन्दी को, लोगों के सामने रखेगें, तो हिन्दी के पाठक जनसंख्या की हर सीमा को पार कर जायेंगे।

आप कुछ भी कह सकती हैं इस सवाल के अंतर्गत। जो सवालों की फेहरिस्त में  मैं आपसे पूछना भूल गया हूँ।            

भोजन का स्वाद बाद में पता चलता है। पहले जरूरी है की हम उसे कैसे परोसते है। बिल्कुल उसी तरह, कहानी और कविता की किताब को किस तरह पाठक से रूबरू कराया जाये ।यह बहुत महत्व रखता है। और शायद  इस क्षेत्र में अभी बहुत काम होना बाक़ी है।आप यक़ीन नहीं करेंगे……

नहीं मैं बिलकुल यक़ीन करूँगा। (दोनों ठहाके लगा कर हँसते हैं। )

नहीं ( हँसते हुए ) ये तो ऐसे अंदाज़ में बोला जाता है।…….. हाँ मैं कह रही थी कि पाठकों का दूसरे संस्करण के लिए जो इंतज़ार है, जो बेताबी है वह मैं अपने फेसबुक और व्हट्सऐप के इनबॉक्स को देखकर समझ जाती हूँ। आये दिन नए- नए लोगों का सन्देश आता है कि कब आ रही है सेकंड एडिशन। पाठको का इतना प्यार मिला की मुझे निर्णय लेना पड़ा कि हमें अपने दूसरे संस्करण में इनके संदेशों को रखकर इनके भावनाओं को सम्मान देना चाहिए।

ये तो बहुत बढ़िया जहाँ तक मेरा ख़याल है पाठकों के विचारों को पुस्तक में जगह देना ये भी अपने आप में आपका नया प्रयोग है।

हाँ कह सकते हैं। लेकिन उद्देश्य कोई प्रयोग का नही बल्कि पाठकों का आभार व्यक्त करने का तरीका है।

 

zindagi kee gullak (1)

 

बहुत धन्यवाद मनीषा जी और आपको आपके लेखकीय सफ़र के लिए ढेर सारी शुभकामनाएं।