हिन्दी लेखिका प्रियंका ओम से बात चीत की, मनीष ओझा ने, पेश है बातचीत का ख़ास हिस्सा।

आज जिस सख्सियत का साक्षात्कार यहाँ पर पोस्ट किया जा रहा है।  वह साधारण नाम वाली असाधारण एवं प्रतिभावान लेखिका हैं।  हम बात कर रहे हैं अभी हाल ही में “अंजुमन प्रकाशन” से आई हिंदी कहानी संग्रह “वो अजीब लड़की” की लेखिका प्रियंका ओम जी की।  जी हाँ आपने (प्रियंका ) ने नए लेकिन ज़ोरदार तरीके से हिंदी कथा संसार में दस्तक दिया है।  चंद  समय में इनकी कहानी संग्रह बिकी नहीं बल्कि हाथो हाथ ली गयी।  और  कुछ ही समय में इनकी किताब का दूसरा संस्करण भी आ गया। एवं सबसे ख़ास बात प्रियंका जी की किताब पढने से पहले इनके ऊपर लगाये गए कुछ आरोपों की वजह से मेरी नज़र में  प्रियंका जी की छवि कुछ और थी परन्तु किताब पढने के बाद छवि ने सम्माननिये आकार ले लिया। आइये कुछ बात चीत करते हैं प्रियंका जी से …..13282059_997959100325724_40245286_n

 

मनीष – सर्वप्रथम हिंदी की बेस्ट सेलर बनने के लिए आपको बहुत बहुत शुभकामनायें। 

प्रियंका ओम – जी शुर्किया ! मैंने तो बस लिखा है बेस्ट सेलर तो पाठको ने बनाया है।

“लाल बाबू” आपकी कहानी संग्रह “वो अजीब लड़की” की एक कहानी है। कैसे संभव हो पाया एक चंचल चरित्र के पुरुष की मानसिकता  को समझकर उसे पन्ने  पर हूबहू  उतारना, जबकि आप एक महिला हैं ?

देखिये मैं हमेशा कहती हूँ “आस पास के किस्सों से ही कहानी बनती है” जो हम अपने आस पास देखते हैं, महसूस करते है उसे लिखना तभी संभव हो पाता है, जब आप चरित्र को जीने लगते हैं। लाल बाबू को लिखते हुए कई बार मैं घर में बात करते हुए बिहारी शब्द इस्तेमाल करने लगती थी। इस चरित्र को लिखना इतना मुश्किल भी नहीं था। लालबाबू कोई एक व्यक्ति नहीं बल्कि वो समस्त बीमार लोग हैं जो इस बीमारी से ग्रस्त हैं। ऐसे लोग मौका परस्त होते हैं। और इन जैसों से हम आये दिन दो चार होते रहते हैं।

“सॉरी” मैं नहीं बोल रहा हूँ बल्कि आपकी एक कहानी है इस नाम से।  सॉरी  एक शब्द है और इस शब्द के इर्द गिर्द आपने एक स्वाभाविक ताना बाना बुना है। रोमांटिक माहौल में एक लड़की और लड़के के  ग़ुस्से और रोमांस से भरपूर मनोदशा का चित्रण किया है। ऐसे में सवाल है कि यथार्थ चित्रण आप कर कैसे पाती है ?

मैं शादी सुदा हूँ। और ऐसी नोक झोंक सभी शादी सुदा के जीवन में होती रहती है। किसी भी रिश्ते में सॉरी कहना बहुत मुश्किल होता है। ख़ास कर हम जिनसे प्रेम करते हैं। ऐसा देखा गया है अगर हम किसी अनजान को दुख पहुचाते हैं तो तुरन्त सॉरी कहते हैं लेकिन यही सॉरी किसी अपने से कहना ख़ास कर जिससे प्रेम करते हैं उसे कहना बहुत मुश्किल होता है। ये मुश्किल क्यों होता है यही इस कहानी में लिखा है। उस वक़्त हम क्या सोचते हैं। कैसा महसूस करते हैं। यही चित्रण है। फेसबुक की मेरी बहुत सी महिला मित्र ने कहा ये उनके साथ होता है। मैं कहानी के पात्र को स्वयं जीती हूँ। उसे आत्मसात कर लेती हूँ। मेरी एक कहानी है “सौतेलापन” जिसे मैंने कई किस्सों को जोड़ कर बुना है। मेरी एक मित्र ने कहा “सौतेलापन” उसके साथ भी हुआ है लेकिन उसके दो बच्चे है और वो दोनों को समान प्यार करती है। क्योंकि उसने ऐसा करने का निर्णय लिया था। क्या कोई माँ बाप ये सोचता है कि  वो अपने बच्चे को कम प्यार करेगा ? नहीं कभी नहीं। लेकिन ये सौतेलापन आ ही जाता है। इसलिए इस कहानी को लिखते वक़्त मुख्य पात्र मैं खुद बनी और इसका अंत मैंने अपनी सोच के हिसाब से लिखा जो कहानी को जस्टिफाई करता है।

सबसे इम्पोर्टेन्ट सवाल।  आपके ऊपर कुछ लोगों का आरोप है कि आप सेक्स को बेवजह प्रमुखता से उठाती हैं  सिर्फ सनसनी क्रिएट करने के लिए।  आप क्या कहना चाहेंगी

देखिये कहने वाले तो कहेंगे ही। इंसान उसी के बारे में बात करता है जो सफल है।

(बीच में टोकते हुए) अच्छा तो आप स्टार की तरह महसूस कर रही हैं……

नहीं मनीष जी ऐसी कोई बात नहीं है ( हँसते हुए कहती हैं ) पर लोग तो प्यार बहुत दे रहे हैं।  आप कह भी सकते हैं स्टार … हाहहा हहहह  ।

आप गांव- शहर, देश -विदेश हर जगह का माहौल बखूबी दर्शा लेती हैं जैसा कि आपके कहानी संग्रह में देखा जा सकता है । यह कैसे संभव हो पता है ?

देखिये मैं रहती विदेश में हूँ (darcity तंज़ानिया अफ्रीका में) लेकिन जड़े गाँव से जुड़ी हैं। मेरा जन्म शहर में हुआ है और परवरिश भी। लेकिन शहर में रहकर भी गाँव से जुड़े रहे। दरख़्त की क़िस्मत में जड़ो से जुड़े रहना ही लिखा होता है।

कैंसर जैसे बीभत्स रोग से ग्रसित रोगी के परिवार को आपने अपनी कहानी “मौत की ओर” में जीवंत कर दिया है।  आप हर घटना, हर दृश्य को कितना करीब से अनुभव करती हैं

असल में मेरी माँ की मौत कैंसर से हुई है। उस वक़्त मेरी उम्र बहुत कम थी लेकिन आज भी कुछ नहीं भूली हूँ। माँ की मौत के दस साल बाद परिवार में कैंसर से एक और मौत हुई । मन में हमेशा डर रहता है कहीं मुझे भी तो नहीं। इसी डर को मैंने उकेरने की कोशिस की है। और पाठको द्वारा ये कहानी खूब सराही भी गई है इसलिए मुझे लगता है मैं सफल भी हूँ।

नए लेखकों को क्या सन्देश देना चाहेंगी ? और हिंदी लेखन में किन कठिनाइयों  का सामना करना पड़ा ? एवं अंग्रेज़ी लिटरेचर में स्नातक “प्रियंका ओम” ने  हिंदी को लेखन के लिए क्यों चुना ?    

लिखने के लिए पढ़ना जरुरी है ये सब जानते हैं, लेकिन शर्त नहीं। नए लेखकों से यही कहना चाहूंगी की अगर वो इसलिए लिख रहे हैं कि पाठक उन्हें पढ़े तो पुराने साहित्य के अलावा नए लोगों की किताब भी पढ़ें जिससे ये पता चलेगा कि लोग क्या लिख रहे है और क्या पढ़ा जा रहा है। कठिनाई जैसे किसी शब्द से मेरा पाला नहीं पड़ा है। आज हज़ार रास्ते हैं। एक बंद तो दूसरा खुला मिलता है। बस अपनी आँखे और दिमाग खुली रखने की जरुरत है। और अगर आपकी कलम में ताक़त है तो आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता।
हिंदी लेखन को चुनने के पीछे हिंदी से लगाव ही है। हाँ इसकी शुरुआत की वजह “सत्य प्रकाश असीम” बने। जिन्होंने मेरी लिखी एक इंग्लिश कहानी को हिंदी में लिखने कहा और यहीं से हिंदी लेखन की शुरुआत हो गई।

सत्य प्रकाश जी को, इतनी प्रतिभाशाली लेखिका, हिंदी में लाने के लिए कोटि कोटि धन्यवाद । अंत में मैं अपनी बात यही कहना चाहूंगा कि आप कलम की जादूगरनी हैं। आपके ऊपर आरोप है की आप सेक्स को बेवजह लिखती हैं, लेकिन मैं इस आरोप से इत्तेफ़ाक़ नहीं रखता  क्यूंकि सौतेलापन और मौत की ओर जैसी आपकी कहानियां सेक्स से दूर हैं फिर भी जीवंत हैं।

जी शुक्रिया। जब भी कोई ऊपर उठता है या उठने की कोशिस करता है उसे कोई तरीके से रोकने की कोशिस की जाती है। उसे नीचा दिखाने की कोशिस की जाती है। लेकिन इससे फर्क नहीं पड़ता। सेक्स बिना जीवन संभव है क्या ? अगर सेक्स नहीं होता तो न आप होते न मैं। मेरी शीर्षक कहानी “वो अजीब लड़की” में एक जगह मैंने लिखा है “आज की दुनियां में पेट की भूख से बड़ी शरीर की भूख है” और यही सच है। अगर ऐसा नहीं होता तो रोज बलात्कार की घटनाएं सुनने में नहीं आती और न ही फेसबुक पर रोज महिलायें इनबॉक्स में आने वाले पुरुषों के खिलाफ़ पोस्ट लिखतीं। वर्चुअल दुनियां में सेक्स में  effected हैं। ढ़ेरों सेक्स चैट ग्रुप बने हैं। लाखों पोर्न वेबसाइट यूँ ही तो नहीं बनी। साहित्य समाज का दर्पण है। शुरू से ही जैसा है वैसा लिखा गया है। गाय गोबर भी लिखा गया है और लिहाफ ठंडा गोस्त जैसी कहानियां भी कालजयी हैं। हमेशा से समाज के दोनों स्वरुप को लिखा गया है लेकिन हाँ कुछ जड़ लोग जाहिरी तौर पर इसे मानने से इनकार करते है लेकिन इसका मतलब यह नहीं की इससे इनकार करते हैं।

आपकी बातों को सुनकर बड़ा खूबसूरत किस्सा याद आया, मैं हिंदी फिल्म “डर्टी पिक्चर” देखने गया हुआ था। बड़ी लम्बी लाइन लगी हुयी थी टिकेट खिड़की पर, मैं भी भीड़ में अपने परिचित चेहरों को ढूँढने की कोशिस कर रहा था। कई सारे हम उम्र और बड़े-छोटे दिखाई दिए, लेकिन मैं हैरान तब हुआ जब मैंने देखा, मेरे एक बड़े ख़ास सीनियर आये हुए थे, और  वे चुपके से गेट के कोने में खड़े सबसे बचने की कोशिस कर रहे थे, मैं उनके पास पहुँच गया। प्रणाम किया। झेपते हुए उन्होंने कहा “अरे बड़ा नाम सुन रहा था इस फिल्म का तो मैंने सोचा देखूं क्या दर्शन (philosphy) दिखाया गया है इसमें ?” मैंने कहा ज़रूर ज़रूर। आप जानती हैं वो शरमा क्यूँ रहे थे ? क्यूंकि वे भारतीय संस्कृति रक्षा के तथाकथित ठेकेदार थे और बजरंगबली के अनन्य भक्त ।

(हँसते हुए) तो मनीष जी आपने उनका पीछा नहीं छोड़ा ?

जी नहीं ?

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दोनों लोग हँसते हैं । बहुत बहुत धन्यवाद आपको प्रियंका जी बातचीत के लिए।